Research and Development

Bio Energy

बायोगैस प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अनुसंधान, डिजाइन, विकास और कार्य प्रदर्शन संबंधी मंत्रालय की नीति/दिशानिर्देशों के अंतर्गत, मंत्रालय के नीतिगत निर्देशों के अंतर्गत पूर्व में अनुमोदित निम्न परियोजनाओं को वर्ष के दौरान जारी रखा गयाः-

 

1.     आईआईटी-गुवाहाटी मे “लिग्नोसेल्युलर बायोमास का उपयोग करते हुए 3 केडब्ल्यू बायोगैस आधारित बिजली उत्पादन प्रणाली का विकास और कार्य प्रदर्शन मूल्यांकन” इस परियोजना के अंतर्गत, एक गैसोलीन एसआई इंजन को 100% बायोगैस ईंधनचालित एसआई इंजन में बदलने के लिए 5 एचपी के एक गैसोलीन इंजन के प्रचालन मापदंडों को अनुकूलित किया गया। 16 मी3 बायोगैस प्रतिदिन लिग्नोसेल्युलोसिक फीड स्टॉक सामग्री, जिसमें मुख्य रूप से गाय का गोबर, धान की भूसी डक वीड और स्विच ग्रास होते हैं, से उत्पन्न की जाती है और इस परियोजना के अंतर्गत आईआईटी गुवाहाटी द्वारा औआनियाती सतारा, उत्तरी गुवाहाटी, असम में सोलर सहायता बैकअप प्रणाली से एकीकृत एक 3 केडब्ल्यूई (kWe) बायोगैस बिजली उत्पादन इकाई को सफलतापूर्वक स्थापित और अनुरक्षित किया गया है। अशोधित बायोगैस के उपयोग द्वारा बिजली उत्पादन की संभावित क्षमता प्रदर्शित करने के लिए सफलतापूर्वक एक केंद्र स्थापित किया गया है और यह स्थानीय उद्यमियों और डेयरी फार्मों के लिए ऑफ-ग्रिड बिजली उत्पन्न करने हेतु तकनीकी जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रशिक्षण और ज्ञान केंद्र बन गया है। आवंटित परियोजना के सभी उद्देश्य प्राप्त किए गए हैं और परियोजना पूर्णता की अंतिम रिपोर्ट प्राप्त हुई है।



2.     तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयम्बटूर (तमिलनाडु) में "अपशिष्ट जल और ठोस अपशिष्ट शोधित करने के लिए स्थानीय स्तर पर उपलब्ध माध्यम का प्रयोग करते हुए हाइब्रिड-हाई रेट बायो-मीथेनेशन रिएक्टर का विकास" पर कार्य पूरा हो चुका है। इस परियोजना के अंतर्गत, प्रयोगशाला स्तर पर तीन हाइब्रिड रिएक्टर ऐक्रिलिक शीट के साथ तैयार किए गए, जिसमें से एक कंट्रोल के रूप में, और अन्य दो रिएक्टर विभिन्न पैक माध्यमों पर काम करते हैं। 7 से 7.5 pH वाले निस्सारक के साथ रिएक्टरों की स्थिरता प्राप्त की गई और प्रत्येक रिएक्टर में 250-300 मिली बायोगैस उत्पादन देखा गया। सामुदायिक अपशिष्ट जल के साथ हाई रेट रिएक्टर और हाइब्रिड हाई रेट रिएक्टर का प्रदर्शन मूल्यांकन कार्य पूरा किया गया और एचआरटी को अनुकूलित किया गया। परियोजना पूर्ण होने की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है।



3.     उत्तर भारतीय राज्यों में धान की पराली को खेतों में जलाने से बचाव हेतु एक स्थायी समाधान प्रदान करने के लिए, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली को एमएनआरई द्वारा "तकनीक के व्यवसायीकरण की दिशा में, बायोगैस उत्पादन के लिए धान के पुआल के अपघटन हेतु उपयुक्त पूर्व-शोधन प्रणाली का विकास" शीर्षक वाली एक शोध परियोजना सौंपी गई। शीर्षक "तकनीक के व्यवसायीकरण की दिशा में, बायोगैस उत्पादन के लिए धान के पुआल के अपघटन हेतु उपयुक्त पूर्व-शोधन प्रणाली का विकास” ग्रामीण विकास और प्रौद्योगिकी केंद्र, आईआईटी, दिल्ली द्वारा। इस परियोजना के तहत, अलग-अलग तापमान और रिएक्टर लोडिंग दरों पर धान की पराली के पूर्व-शोधन के लिए प्रयोगशाला पैमाने पर एक हाइड्रोथर्मल रिएक्टर विकसित किया गया। इसके अलावा, मॉडल के प्रदर्शन मूल्यांकन के लिए खेत स्तर पर प्रयोग करने के लिए 50 लीटर क्षमता वाले एक फील्ड स्केल हाइड्रोथर्मल रिएक्टर का निर्माण किया गया। अध्ययन में प्रयुक्त रिएक्टर द्वारा हाइड्रोथर्मल पूर्व-शोधन प्रक्रिया की ऊर्जा खपत का विस्तृत विश्लेषण किया गया है। धान की पराली की हाइड्रोथर्मल पूर्व-शोधन प्रक्रिया में ऊर्जा की मांग कम करना, आगे की कार्ययोजना में शामिल है, अपेक्षाकृत बड़े आकार वाले एनाएरोबिक रिएक्टरों में ऊर्जा खपत के साथ बायोगैस उत्पादन क्षमता हेतु 20% से अधिक टीएस की लोडिंग वाले प्रयोगों का अध्ययन किया जाएगा। हाइड्रोथर्मल पूर्व-शोधन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बायोगैस उत्पादन के लिए आवश्यक हाइड्रोलिक रिटेंशन समय काफी कम हो जाता है, जो धान की अशोधित पराली के लिए लगभग 100 दिनों के बजाय केवल 20-25 दिन रह जाता है।

दस्तावेज: आर एंड डी प्रारूप